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गावँ में श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया गया डाला छठ।

सराय सागर मालटारी।

                   "डाला छठ"

गावँ में लोक आस्था व भगवान सूर्य की आराधना का महापर्व डाला छठ नहाय-खाय के साथ शुरु हुआ पर्व बड़े ही धूमधाम एवं पारम्परिक तरीके से मनाया गया।
प्रातः उठकर व्रती महिलाओं ने गंगा स्नान करने के  बाद विधि-विधान पूर्वक पूजा- अर्चना कर कद्दू व सरसो के साग के साथ सात्विक भोजन ग्रहण किया। छठ पूजा की पूर्णाहुति उगते हुए भगवान भास्कर को अध्य देने के बाद संपन्न हुई।
इस पर्व के विषय में यह मन जाता है कि- नहाय खाय के साथ शुरू हुआ भगवान तपन का यह महापर्व उगते हुए भगवान मार्तड को अध्य देने तक कुल चार चरणो मे संपन्न होती है। पहले दिन की पूजा के बाद से नमक का त्याग कर दिया जाता है। छठ पर्व के दुसरे दिन को खरना के रुप मे मनाया जाता है। इस दिन भूखे-प्यासे रहकर खीर का प्रसाद तैयार करती है। महत्वपूर्ण बात  है कि यह खीर गन्ने के रस की बनी होती है इसमे चीनी व नमक का प्रयोग नही किया जाता है। सायंकाल इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद माताए निर्जल व्रत की शुरुआत करती है। आखिरी दिन व्रती महिलाए कच्चा दूध व प्रसाद ग्रहण करके व्रत व पूजा की पूर्णाहुति करती हैं।

सूर्य और षष्ठी की पूजा।

छठ महापर्व पर गीत षष्ठी देवी के गाए जाते हैं, लेकिन आराधना भगवान सूर्य की होती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, सूर्य और षष्ठी देवी भाई-बहन हैं। मान्यता है कि सुबह और शाम सूर्य की अरुणिमा में षष्ठी देवी निवास करती हैं। इसलिए भगवान सूर्य के साथ षष्ठी देवी की पूजा होती है।

डूबते सूर्य को अर्घ्य।

छठ पर्व के तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को पूर्ण उपवास रहकर व्रती माताए सायंकाल डूबते हुए भगवान कर्ता-धर्ता को अर्घ्‍य देगी।

उगते सूर्य को अर्घ्य।

षष्ठी महापर्व की पूर्णाहुति चतुर्थ दिन शुक्रवार को उगते सूर्य को अर्घ्‍य देने के साथ संपन्न होती है।
अर्घ्य देने के बाद व्रती महिलाएं पारन (अल्‍पाहार) करती हैं।

कैसे करें पूजन।

षष्ठी के दिन पूर्वाह्न में वेदी पर जाकर छठ माता की पूजा की जाती है। अपराह्न घाट पर वेदी के पास जाए। पूजन सामग्री वेदी पर चढ़ाएं व दीप जलाएं। सूर्यास्त अस्ताचलगामी सूर्य को दीप दिखाकर प्रसाद अर्पित किया जाता है। दूध और जल चढ़ाएं जाते हैं, फिर दीप जल में प्रवाहित किया जाता है। व्रता वेला (सुबह) में परिजनों के साथ निकल कर घाट पर पहुंच व्रती पानी में खड़े होकर सूर्य उदय की प्रतीक्षा करतें हैं। सूर्य का लाल गोला जब दिखने लगता है तो दीप अर्पित कर उसे जल में प्रवाहित करते हैं। फिर हाथ से जल अर्पित किया जाता है। दूध चढ़ाएं और भगवान शुचि ?(सूर्य) को अर्पित किया जाता है।

पौराणिक-लोक कथाओं से गुंथा है छठ पर्व।

लोक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कंद को छह कृतिकाओं ने अपना स्तनपान कराकर उसकी रक्षा की थी। उस समय स्कंद के छह मुख हो गए थे। कृतिकाओं द्वारा उन्हें दुग्धपान कराया गया था, इसलिए ये कार्तिकेय कहलाए। लोकमान्यता यह भी है कि यह घटना जिस मास में घटी थी उस मास का नाम कार्तिक पड़ गया इसलिए छठ मइया की पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को किया जाता है।

प्रसाद में अनिवार्य ठेकुआ।

सूर्य षष्ठी पूजा में ऋतुफल के अतिरिक्त आटा, गुड़ और घी से निर्मित ठेकुआ प्रसाद होना अनिवार्य है। इस पर सांचे से भगवान प्रकाश रुप के रथ का चक्र अंकित किया जाता है। पूजा सामग्री में पांच तरह के फल, मिठाइयां, गन्ना, केले, नारियल, पाइनेपल, नींबू, शकरकंद, अदरक नया अनाज शामिल होता है।

डाले में सजती है पूजा सामग्री।

व्रती महिलाएं पूजा सामग्री सजाती है जिसे पुरुष शाम को नए बांस के डाले में रखकर जलस्रोत किनारे ले जाते है। महिलाएं पानी में खड़ी होकर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देंती हैं। अगले दिन सुबह पूजा सामग्री के साथ अंकुरित चने दही लेकर फिर झील पर पहुंच पानी में खड़े हो उदय होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाया जाता है।
गावँ में यह पर्व प्रति वर्ष मनाया जाता है, जिसमें गावँ के सभी लोग आस्था और विश्वास के साथ इस पर्व का आनन्द लेते हैं।

रिपोर्ट- सराय सागर मालटारी ब्यूरो।

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