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गावँ में धूमधाम से मनाई गई संविधान निर्माता की जयंती।

सराय सागर मालटारी।

      "बाबा साहब डॉ० भीमराव अंबेडकर जयंती"

गावँ कवरेज: आज गावँ में बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर की जयंती बड़े धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ मनाई गई।गाँव से आकर्षक झांकी निकाली गई तथा बाजार में घुमाया गया साथ ही भक्त नाचते गाते और अबीर गुलाल उड़ाते चल रहे, थे, महिलाएं मंगल गीत गा.रही थी। झांकी जिधर से गुजरती उधर देखने वालों का तांता लग जाता था।
बतादें : संविधान निर्माता और भारत रत्न डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की आज (14 अप्रैल) जयंती है। डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के महू गांव में हुआ था। वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की 14वीं व अंतिम संतान थे। इनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना में काम करते थे। ये महार जाति से ताल्लुक रखते थे, जिसे हिंदू धर्म में अछूत माना जाता था। समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ व संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर को बाबा साहेब के नाम से भी जाना जाता है। भीमराव आंबेडकर आज की राजनीति के ऐसे नायक है, जिसे हर पार्टी 'अपना' बनाना चाहती है। लेकिन बाबा साहेब समाज के वो नायक थे, जो ताउम्र गरीब और वंचित वर्गों की आवाज बने। उन्हें भले ही दलितों का मसीहा माना जाता हो, लेकिन यह भी सच्चाई है कि उन्होंने सिर्फ दलितों की ही नहीं बल्कि समाज के सभी शोषित-वंचित वर्गों के अधिकारों की आवाज उठाई।
बाबा साहेब ने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और दलितों के खिलाफ सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं कहा जा सकता है कि आंबेडकर सिर्फ दलितों के थे। उन्होंने समाज के हर उस वंचित वर्ग के अधिकारों की बात की, जिसे समाज में दबाया गया। उन्होंने श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया। डॉ. आंबेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन चलाया। अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया।
15 अगस्त, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व मे आई, तो उसने आंबेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार किया। देश के पहले संविधान के निर्माण के लिए उन्हें 29 अगस्त, 1947 को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। फिर दो वर्ष, 11 माह, 18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ। 26 नवंबर, 1949 को इसे अपनाया गया और 26 जनवरी, 1950 को लागू कर दिया गया।
32 डिग्रियां और 9 भाषाओं के जानकार आंबेडकरकी गिनती दुनिया के सबसे मेधावी व्यक्तियों में होती थी। उन्हें देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों से पीएचडी की कई मानद उपाधियां मिली थीं। यही वजह है कि आंबेडकर को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत का पहला कानून मंत्री बनाया था।

मालटारी ब्यूरो।

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